हरतालिका तीज की कथा की जानकारी hartalika vart katha Hartalika Teej , Mata Parvati Aarti
ऐसा माना जाता है कि हरतालिका , तीज के दिन माता पार्वती की आरती करने पर और व्रत कथा सुनने स मिलेगा आपको पति परमेशवार का अखंड साथ मिलता है और परिवार को हमेशा स्वास्थ लाभ पाहुचेगा
हरतालिका तीज की Aarti and Katha:- हिन्दू कैलेंडर के अनुसार हर साल भाद्रपद महीने की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का व्रत रखा जाता है. यह पर्व सुहागिनों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है तथा कुंवारी कन्याएं भी इस व्रत का पालन करती हैं! हरतालिका तीज का व्रत भगवान शिव और मा पार्वती को समर्पित किया गया है. आज के दिन महिलाएं व्रत रखकर पूर्ण विधि विधान के साथ भगवान महादेव और माता पार्वती की पूजा पाथना करती हैं तथा अपने सुहाग की लंबी आयु की कामना करती हैं. माना जाता है कि इस दिन माता पार्वती की आरती करने एवं व्रत कथा सुनने पर आपको पति का अखंड साथ मिलता है एवं परिवार को स्वास्थ लाभ पहुँचता है!
हरतालिका तीज व माता पार्वती की आरती
जय पार्वती माता जय पार्वती माता
ब्रह्म सनातन देवी शुभ फल कदा दाता।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
अरिकुल पद्मा विनासनी जय सेवक त्राता
जग जीवन जगदम्बा हरिहर गुण गाता।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
सिंह को वाहन साजे कुंडल है साथा
देव वधु जहं गावत नृत्य कर ताथा।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
सतयुग शील सुसुन्दर नाम सती कहलाता
हेमांचल घर जन्मी सखियन रंगराता।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
शुम्भ निशुम्भ विदारे हेमांचल स्याता
सहस भुजा तनु धरिके चक्र लियो हाथा।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
सृष्टि रूप तुही जननी शिव संग रंगराता
नंदी भृंगी बीन लाही सारा मदमाता।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
देवन अरज करत हम चित को लाता
गावत दे दे ताली मन में रंगराता।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
श्री पपार्वती मैया की जो कोई गाता
सदा सुखी रहता सुख संपति पाता ।
जय पार्वती माता मैया जय पार्वती माता।
हरतालिका तीज कथा Hartalika Teej की Katha
! पौराणिक कथा के अनुसारहरतालिका तीज व्रत सबसे पहले माता पार्वती ने रखा था सखियों द्वारा हरित मां पा र्वती ने इस कठोर व्रत को किया था इस व्रत के फलस्वरुप ही माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाया था इस व्रत के पीछे माता पार्वती और भगवान शिव की कथा काफी प्रचलित है कहा जाता है कि पिता के यज्ञ में अपने पति शिव का अपमान देवी सती सहन नहीं कर सकी और उन्होंने खुद को यज्ञ की अग्नि में भस्म कर दिया इसके बाद
अगले जन्म में उन्होंने राजा हिमाचल के यहां पर जन्म लिया और इस जन्म में भी उन्होंने भगवान शंकर महादेव को ही पति के रूप में पाने के लिए तपस्या की देवी पार्वती ने तो मन ही मन भगवान शिव स्वरूप को अपना पति मान लिया था और वह हामेशा भगवान शिव की तपस्या में लीन रहतीं थीं पुत्री की यह हालत देखकर राजा हिमाचल कोबहुत चिंता सताने लगी इस संबंध में उन्होंने नारदजी से चर्चा करी . की उनके कहने पर उन्होंने अपनी बीवी पुत्री उमा का विवाह भगवान विष्णु से कराने का निश्चय किया. है
पार्वती जी विष्णुजी से विवाह नहीं करना चाहती थीं पार्वतीजी के मन की बात जानकर उनकी सखियां उन्हें लेकर घने जंगल में चली गईं इस तरह सखियों द्वारा उनका हरण कर लेने की वजह से इस व्रत का नाम हरतालिका व्रत पड़ा भाद्रपद शुक्ल तृतीया तिथि के हस्त नक्षत्र मे माता पार्वती ने नदी की रेत से शिवलिंग का बनाया और फिर भोलेनाथ की स्तुति में लीन होकर रात्रि जागरण किया! उन्होंने अन्न का त्याग भी किया ये कठोर तपस्या लगातार बारह साल तक चलती रही तब माता के इस कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और इच्छा के अनुसार उनको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया!
इस व्रत को हरितालिका इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि पार्वती की सखी उन्हें पिता के घर से हरण कर जंगल में ले गई थी जहा देवी पार्वती ने मन ही मन भगवान शिव शंकर को अपना पति मान लिया और वह सदैव ही भगवान शिव की तपस्या में लीन रहतीं थींब पार्वती जी के मन की बा त जानकर उनकी सखियां उन्हें लेकर घने जंगल में चली गईं इस तरह सखियों द्वारा उनका हरण कर लेने की वजह से इस व्रत का नाम हरतालिका व्रत पड़ा है

