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भगवत गीता के 30 महत्वपूर्ण ज्ञान जो आपकी जिंदगी बदल दे | भगवत गीता की 30 ज्ञान की बातें

भगवत गीता के 30+ महत्वपूर्ण ज्ञान जो आपकी जिंदगी बदल दे | भगवत गीता की 30 ज्ञान की बातें 

 श्रीमद् भागवत  गीता में संग्रहित उपदेशों के अनुसार श्री कृष्ण ने सबसे बड़े धर्मयुद्ध महाभारत में अपने शिष्य अर्जुन को कुछ उपदेश दिए थे, जिससे उस युद्ध को जीतना अर्जुन के लिए बहुत आसान हो गया था। गीता के उपदेशों  को जीवन का सार या जीवन के उपदेश भी कहते हैं,वहीं अगर हिन्दू धर्म के इस महान ग्रंथ गीता के उपदेशों को अपने जीवन में सम्मिलित कर लिया जाए तो मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति के जीवन का भी बेड़ा पार हो सकता है। इसके साथ ही इस महान ग्रंथ गीता में जीवन की वास्तविकता और मनुष्य धर्म से जुड़े उपदेश दिए गए हैं। कई बार ऐसा होता है कि हमें अपनी समस्या का समाधान नहीं मिलता हैं या फिर मुसीबत  के समय में हम बहुत परेशान हो जाते हैं।कई लोग तो गुस्से में अपना आपा खो बैठते हैं तथा फिर अपनी समस्याओं से विचलित होकर भाग खड़े होते हैं,  और मृत्यु को गले लगा लेते है , ऐसे में गीता में लिखे गए यह उपदेश हमारी सारी समस्याओं को चुटिकयों में हल कर देते हैं और हमें जीवन जीने की कला सिखाते हैं साथ ही सफल जीवन की प्रेरणा देते हैं। भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत के युद्ध में अर्जुन को गीता के उपदेश  सुनाए थे जिसे सुनकर अर्जुन को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।वहीं यह गीता का उपदेश युद्ध भूमि में खड़े अर्जुन के लिए नहीं था बल्कि यह सम्पूर्ण मानव जाति के लिए हैं और यह उपदेश एक सही तरीके से तों लोगों के जीवन में सफलता पाने के लिए अचूक मंत्र भी है। गीता सार  जो की इंसान के भीतरी मन की उठापटक को बिलकुल शांत कर उसे सफल जीवन व्यतीत करने में बहुत सहायता करते हैं भागवत गीता के यह 30 उपदेश आपको अपनी जिंदगी में हर स्थान पर बहुत कम आएंगे, जिंदगी की हर मुश्किल में आपको रास्ता दिखाएंगे, ये दिव्य उपदेश  जानना समझना हर मनुष्य लिए बहुत ही जरूरी है  ०१-  सारे दुखों का कारण है  किसी को अपना मानना  है                                                                 गीता का सबसे पहले उपदेश यह है की आपके सारे दुखों का कारण हैं किसी को अपना मानना है , आप कभी गौर करना आपकी जिंदगी के सारे दुख सारी तकलीफें,  सारी चिंताएं वहीं से आती  है जहां आपका अपनापन होता है , यह मेरा है , यह मेरा अपना है वहीं से आपकी जिंदगी में दुख आना शुरू हो जाते हैं इसे हम एक कहानी के माध्यम से समझ सकते है -    एक व्यक्ति के पास एक बहुत बड़ा महल था उसने जिंदगी भर की सारी संपत्ति लगाकर उस महल को बनाया था आसपास के शहर के कई लोग उसके महल को देखने आते थे कई बड़े से बड़े सेठ उसके महल को खरीदने की कोशिश करते थे पर वो महल उसका अहंकार था उसकी जीने की वजह था उसका उस महल से  बहुत मोह  था , एक दिन उसके महल में आग लग जाती है  और वो उस समय कही बाजार गया हुआ रहता है , जब वो घर लोट कर आता है तो देखता है की उसका  महल जल रहा है अपने घर को आग में जलता हुआ देखकर उसे इतना दुख हुआ की उसने कहा अगर ये महल नहीं रहेगा तो मैं भी जिंदा नहीं रहूंगा अगर मेरा महल ही जल गया तो मे जी के क्या करूंगा और वो भी आग में छलांग लगाने की कोशिश करने लगा ,तो किसी ने उसे रोककर कहा की भाई यह जो तुम्हारा महल है इस महल का सौदा कल तुम्हारे बेटे ने किसी के साथ कर लिया है जब उसे पता चला की यह महल अब मेरा नहीं रहा किसी और का हो चुका है तो उसकी सारी चिंता खत्म हो गई तब जैसे की  और लोग उसे जलते हुए महल का तमाशा देख रहे थे वैसे वह भी खड़ा होकर तमाशा देखने लगा , कुछ देर बाद उसका बेटा आया वह अपने  बेटे को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ उसे आशीर्वाद देते हुए कहने लगा की तेरे जैसा बेटा तो बहुत भाग्य से ही मिलता है , बेटे तूने तो मेरी जिंदगी बचा ली आज इस महल में आग लगी है उसे तूने पिछले दिन ही इस महल का सौदा कर दिया वो अपने पिताजी को देखने लगा और बोला पिताजी मैं इस महल के सौदा करने के लिए बात तो करने गया था पर सौदा अभी पक्का हुआ नहीं है, जब उसके पिता ने यह सुना की अभी इस महल का सौदा हुआ ही नहीं है तो वो फिर से फूट-फूट कर  रोने लगा फिर से अपनी छाती पीटने लगा , इंसान वही है लेकिन जब महल मेरा है तब वो दुख भी देता है खुशी भी देता है लेकिन जब वो मेरा नहीं है उससे मेरा कोई रिश्ता नाता नहीं है वही सारे दुखी खत्म हो जाते हैं ऐसे ही जिंदगी में जब किसी इंसान को ,किसी रिश्ते को हम अपना मांन  लेते हैं तो वहीं से ही सारे दुखों की शुरुआत हो जाती है वहीं से हर तकलीफ की शुरुआत होती है तो मित्रो श्रीमद् भागवत गीता का पहले उपदेश यही है की आप जैसे ही किसी को अपनी जिंदगी जीने की वजह मान लेते हो इसके बिना तो मैं जी ही नहीं सकता तब  वो वस्तु  इंसान बहुत दुख देती है                                                                          ०२- श्री कृष्ण भगवान ने गीता में कहा है ” अवश्यमेव  उपभोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ” अर्थात  कर्मों का फल तो भोगना ही पड़ेगा चाहे कोई कितनी ही होशियारी कर ले पर कर्मों का फल सबको मिलेगा         गीता का दूसरा उपदेश  यह है की अवश्यमेंव  उपभोक्तव्य  कृतं कर्म शुभाशुभम् ” इसका अर्थ यह  है की आपने कोई भी कर्म किया हो उसका फल आपको जरूर ही भोगना पड़ेगा , यदि  आपने अच्छे कर्म किये हैं तो आपके अच्छे कर्मो की वजह से ईश्वर आपको मुश्किल वक्त से बचा लेंगे ,अगर आपने गलत कर्म किया हैं पाप किया है तो उसकी सजा भी आपको जरूर मिलेगी, मित्रो इंसान कितना ही छुपकर बुरा कर्म करें लेकिन कहते हैं की  ईश्वर के चारों तरफ कैमरे लगाए हुए हैं हमारे एक-एक कर्म पर वो परमात्मा अपनी दृष्टि बनाए रखते हैं हमारे एक-एक कर्म का हिसाब होता है, इसे हम एक कहानी के माध्यम से समझ सकते है                                     एक गांव में दो मित्र रहते थे उन दोनों ने विचार किया की हम  इस गांव में धन नहीं कमा पा रहे है तब दोनों धन कमाने के लिए दूसरे शहर में चले गए, वह  कुछ वर्ष रह  कर उन्होंने काफी धन कमाया फिर सोचा की अब हमे अपने घर वापस चलना चाहिए क्योकि हमने पर्याप्त धन कमा  लिया है उस समय पर यातायात की इतनी सुविधा नहीं होती थी वह अपने बैलगाड़ी  पर ही यात्रा करने लगे  चलते-चलते मार्ग में रात हो गई तो उन्होंने विचार किया आज रात हम यही विश्राम करते हैं उसी  समय एक मित्र ने कहा की मैं यहां पर रहकर धन की रक्षा करता हूं तुम बाजार जाकर भोजन की व्यवस्था कर लो, तब दूसरा  मित्र बाजार गया तभी उसके  मन मे  पाप  आ  गया उसने सोचा  इतना पैसा हमने कमाया है अगर मैं मेरे मित्र को यही जंगल में मार दूंगा तो सार  पैसा मेरा हो जाएगा नहीं तो मुझे इस धन का आधा धन इसको देना पड़ेगा तब लालच मे अंधा होकर उसने अपने मित्र के खाने में जहर मिला दिया  और जब वो खाना लेकर के अपने मित्र के पास गया तब उसका मित्र वो जहर वाला खाना खाकर वहीं पर प्राण त्याग देता है इसके बाद वो दूसरा मित्र वो सारा  धन लेकर के अपने घर वापस आ जाता है इसके बाद वो गाव रहने के लिए आ जाता है समय बीतने के साथ  उसके घर में एक पुत्र ने जन्म लिया , जन्म से ही उसका पुत्र अक्सर  बहुत बीमार  रहता था , उस व्यक्ति ने अपने जीवन में जो कुछ भी धन कमाया था उसका वह सारा धन अपने बेटे के इलाज में खत्म हो गया पुत्र बड़ा होता गया और उसका धन नष्ट होता गया ,जब उसका बेटा थोड़ा बड़ा हो गया तो उसके पिता ने पूछा की बेटा तू इतना बीमार  क्यों रहता है, हे पुत्र तुम ठीक क्यों नहीं होते हो मैंने अपनी जिंदगी का सब कुछ तुझ पे लगा दिया पर फिर भी तेरी तबीयत ठीक नहीं रहती तो उसके पुत्र ने बोला की कौन सा बेटा और कौन सा पिता मैं तो तेरा वही मित्र हूं जिसको तूने जंगल में जहर देकर मार दिया था लेकिन मैं अपना वही हिसाब पूरा करने के लिए तेरे पुत्र के रूप में तेरे घर में जन्म लेकर आया हूं अब मेरा तेरा हिसाब बराबर और मेरा जीवन अब यही समाप्त होता है तो मित्रो गीता का उपदेश हमें यही सीखता है कोई अपने आप को कितना भी चालबाज समझता, हो होशियार समझना हो, लेकिन अगर उसने गलत कर्म किया है तो चाहे आज नहीं तो कल उसे उसका फल भोगना ही पड़ेगा                             ०३-  आज में जियो कल की चिंता करना छोड़ दो          गीता का तीसरा उपदेश है की आज मैं जियो कल की चिंता करना छोड़ दो, जो भी व्यक्ति अपनी बीते हुए कल या अपने आने वाले कल आनेवाले दिन में खोया रहता  है वो जिंदगी में कभी खुश नहीं रह  सकता आपको जिंदगी में खुशी सिर्फ और सिर्फ तब मिल सकती  है जब आप वर्तमान में ही ज़िंदगी जिएगे ,तभी आप आज के आनंद का भोग कर सकेगे , बीते हुए कल का और आने वाले कल का कोई वास्तिवक अस्तित्व नहीं होता है वो सिर्फ आपके बुद्धि और आपके विचारों में होता है और उसकी कोई वास्तविकता नहीं होती उसे सिर्फ आप अपने मन के अंदर और बुद्धि के अंदर जीते रहते  हैं लेकिन जिसे आप वास्तव में जीते हैं वो आपका आज होता है अगर आप अपने मन और बुद्धि को अपने भूतकाल और भविष्य कल में अटका के रखेंगे तो याद रखना आप कभी भी  खुश नहीं रह पाएंगे अगर जिंदगी में खुश रहना चाहते हैं तो आज मैं और इसी पल में जीना सीखें                                                                        ०४- जो आपके साथ अधर्म करे ,पाप करे तो उसे दंड अवश्य देना चाहिए -                                                गीता का चौथा उपदेश यह है की जो आपके साथ पाप कर्म करें , गलत करें उसे दंड जरूर देना चाहिए मित्रो अर्जुन श्री कृष्ण  से कहने  लगा की जिनसे  मैं युद्ध करने जा रहा हूं ये सब मेरे भाई हैं मेरे गुरुजन हैं मैं इनके सामने कैसे हथियार कैसे उठाऊं इनको कैसे मारू, तो भगवान श्री कृष्ण  ने अर्जुन से कहा की जिन्हें तुम अपना मानते हो , वह सब अधर्मी है वो सब पाप और अधर्म  के पक्ष में खड़े हैं और अगर तुम इनका वध नहीं करोगे  युद्ध नहीं करोगे  तो समाज में और भी पाप बढ़ेगा क्योंकि जब तक ऐसे पापियो और अधर्मियो  को रोका नही जाएगा,  तो यह और भी ज्यादा पाप और अधर्म करते ही , रहेगे ऐसे ही जब आपके साथ कोई गलत करता है आपको नुकसान पहुंचता है और आप उस अधर्म को सहन  रहते हैं , तो उससे सामने वाले को बल मिलने लगता है वह आपको कमजोर समझने लगता है और आपके साथ बुरा करने को ,वो अपना हक समझने लगता है लेकिन जब आप उसके गलत व्यवहार को उसके अधर्म को रोक लेते हैं और उसका विरोध करते हैं तब वह अपनी सीमा में रहना सिख जाता है अगर इस जमाने में आपको खुश रहना है तो आपको अपनी रक्षा खुद ही करनी होगी कोई आपके साथ गलत करें तो उसको कभी नहीं सहना चाहिए बल्कि उसका  उसका सामना करना चाहिए         ०५- किसी से भी बहुत ज़्यादा मोह कभी मत करना      गीता का पांचवा उपदेश  यह है की किसी से भी हद से ज्यादा मोह कभी नहीं करना चाहिए जिससे भी आप सबसे ज्यादा मोह लगाओगे वही आपको दुख पाहुचाएगा, मोह के कारण से ही आपको कई बार स्वयं का अपमान भी सहाना पड़ता है और कई लोगों को मोह की वजह से स्वयं का अपमान दिखाई नही देता है की सामने वाला मेरी इज्जत कर रहा है या अपमान कर रहा और मैं उसके पीछे मर रहा हूं , वो आपकी आंखों पर  ऐसी पट्टी लगा देता है,  की आपको सच एवं  झूठ तो बिलकुल ही दिखाई नहीं देता हैं,  आपको किसी इंसान का चेहरा दिखाई भी नहीं देता आप जो भी  देखते हैं जो भी सुनते हैं उस पर विश्‍वास कर लेते हैं फिर चाहे आपको कितना ही दर्द भी क्‍यो न  मिल रहा हो, तो मित्रो मोह से जल्दी से जल्दी बाहर आ जाए, वास्तविकता में तो रिश्ते दुख नहीं देते हैं,  आपका मोह आपको बहुत ही दुख देता है जिस दिन आपका मोह खत्म हो जाएगा,  उसी  दिन आपको किसी भी रिश्ते से कोई दुख नहीं मिल सकता                     ०६- वो मत करो जो सब करते हैं वो करो जो तुम्हारे लिए सहीहै-                                                             गीता का छटा उपदेश यह है की आप वो मत करो जो सब करते हैं वो करो जो आपके लिए सही है श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है की जो तेरा कर्तव्य है जो तेरे लिए सही है वो तुझे करना चाहिए , कभी भी वो कम मत करो जो दुनिया कर रही है तब अर्जुन श्री कृष्ण से कहने  लगा की ऐसे भयंकर युद्ध को करने  से अच्छा है की मैं सन्यासी बन जाऊं तो श्री कृष्णा ने अर्जुन से कहा की सन्यासी बनाना तेरा कर्म नहीं है  तेरा धर्म नहीं है तू  क्षत्रिय है तेरा कर्म और तेरा धर्म यही है की तू अधर्म का नाश कर धर्म की रक्षा कर , ऐसे ही हर इंसान का एक अलग कर्तव्य होता है  एक अलग ही धर्म  मार्ग होता है इसलिए  तुम कभी भी उस मार्ग पर मत जाना जहां सारी भीड़ जा रही हो कभी भी वो कम मत करो जो दुनिया करती है तो आप भी इस भीड़ में कही खो जाओगे लेकिन अगर आप वो करोगे जो आपके लिए सही है जो आपकी प्रतिभा है तो दुनिया की सारी  भीड़ में भी आप सबसे अलग नजर आओगे  ०७-धोखा अपने ही देते हैं                                          गीता का सातवां उपदेश यह है की जिंदगी में धोखा अपने ही देते हैं क्योंकि उनको आपकी कमजोरी का पता होता है बाहर वाला आपको धोखा नहीं दे सकता क्योंकि उसको आपके बारे  में पता ही नहीं है की आपको चोट कहां पहुंचती है लेकिन जो आपका अपना है आपका खास है उसे बहुत गहराई से पता होता है की इसकी कमजोरी क्या है वह सोचते है की ऐसा क्या करें जिससे इसको दर्द पहुंच सकता हो, जिससे इसको हम गलत रास्ता दिखा सकते हैं इसको चोट पहुंच सकते हैं क्योकि यह कलयुग है इसलिए हमे  बाहर वालों से नहीं जो हमारे अपने हैं उनसे ही सावधान रहना होता है महाभारत का युद्ध दो अलग राजाओं में नहीं हुआ बल्कि एक ही परिवार के भाइयों बीच में हुआ था सब आपस में एक ही वंश के लोग थे कितनी बार दुर्योधन ने जहर देकर  भीम को मारना चाहा ना जाने कितनी बार दुर्योधन ने पांडवों को जान से करने की कोशिश की कोई भी उसका पराया नहीं था सब उसके भाई ही थे सारी लड़ाइया घर मे ही होती रही इसलिए आपको चोट सिर्फ वही लोग पहुंच सकते हैं जो आपके अपने हैं आपको धोखा सिर्फ वही लोग दे सकते हैं जो आपके अपने हैं                                               ०८-जो इंसान अपनी रक्षा ख़ुद नहीं कर सकता उसकी रक्षा भगवान भी नहीं कर सकते                      गीता का आठवां उपदेश है की जो इंसान अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकता उसकी रक्षा भगवान भी नहीं कर सकते श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा की है अर्जुन तू हर काल में मेरा स्मरण करते रहना और युद्ध भी करते रहना अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा की यह युद्ध तो कुछ दोनों में समाप्त हो जाएगा लेकिन आप जो कह  रहे हैं की  की तू हमेशा तू हमेशा मेरा स्मरण करता है और युद्ध करते रहना तो है माधव हमेशा युद्ध करने का क्या मतलब है तो श्री कृष्णा ने अर्जुन से कहा की जिंदगी एक रणभूमि है इस जीवन में सुख दुख तो आते ही रहेंगे श्रीकृष्ण कहते है की मैंने यह नहीं कहा कि तू चुप और शांत होकर   बैठ जाना और मैं सारे संघर्ष मे कर लूंगा इस शब्द मे बहुत गहराई है गीता के ज्ञान में हमारे जीवन की डोर को ईश्वर पकड़ कर बैठे हैं लेकिन युद्ध तो हमें ही करना है और ईश्वर को याद करना है की हे  ईश्वर मुझे शक्ति देना , मुझे बुद्धि देना ताकि मैं अपनी जिंदगी की साड़ी लड़ाइयां जीत सकु मैं जिंदगी में सही मार्ग पर चल सकू जो लोग यह कहते हैं की हम कुछ नहीं करेंगे सब वो ईश्वर ही करेगा तो आलसी इंसान को देखकर तो भगवान भी घबरा जाता है भगवान ने बुद्धि दी है समझ दी है ईश्वर आपको प्रेरणा देते हैं शक्ति देते हैं लेकिन कुछ पाने के लिए मेहनत तो  स्वयं ही करनी होगी                ०९- कोई भी ऐसी गंदी आदत ख़ुद को मत लगने देना जो आपकी ज़िन्दगी बर्बाद कर दे                                  गीता का 9 वा उपदेश यह है की कोई भी ऐसी गलत आदत खुद को मत लगे देना जो आपकी जिंदगी बर्बाद कर दे यह कहानी  महाभारत कि हैं क्‍योकि यह युद्ध एक बहुत गलत आदत के कारण से ही शुरू हुआ था एक ऐसी  जुए  की लत जहां युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को एवं अपनी पत्नी को दाव पर लगा दिया था जुआ खेलने की गलत आदत की वजह से युधिष्ठिर ने अपना सब कुछ गवा दिया था ,ऐसे ही हम भी अपनी जिंदगी में जब कोई ऐसी गंदी  आदत लगा लेते हैं  चाहे वो कोई भी आदत हो , सभी गलत आदतो में  आपको बर्बाद करने की  शक्ति है अगर आप गलत आदतों को  नहीं छोड़ोगे तो आपका सब कुछ खत्म हो जाएगा इससे पहले की आपकी आदत आपको खत्म करें आप अपनी गलत आदतों को खत्म कर दीजिए       १०- आलसी इंसान कभी कुछ नहीं हासिल कर सकता   गीता का 10वां उपदेश यह है की आलसी इंसान कभी कुछ हासिल नहीं कर सकता अधिकतर लोग सिर्फ योजनाएं बनाते रहते हैं ,की मुझे रहने के लिये बड़ा घर चाहिए मुझे बड़ी गाड़ी चाहिए , मैं दुनिया घूमना चाहता हूं यह सब पाने के बारें मे  सोच लेतें  है लेकिन इन सब चीजो को पाने के लिये मेहनत करना होगा ,वो बहुत कम लोग करते हैं क्योंकि सोचना  बहुत आसान है लेकिन उसके लिए मेहनत करना बहुत मुश्किल है एक अच्छा फिट शरीर हर कोई चाहता है लेकिन उसके लिए व्यायाम तो आपको ही करना होगा जो इंसान आलस कर  के बैठ जाता है उसे ना अच्छा शरीर और ना ही अच्छा जीवन मिलता है जिंदगी में अगर कुछ पाना  चाहते हो तो आलस को अपनी जिंदगी से दूर कर देना आलस के चलते आपको कुछ मिलने वाला तो नहीं लेकिन जो आपके पास है आप वो भी गवा दोगे         ११-जो आपका है वो आपको मिलकर रहेगा और जो आपको नहीं मिला है उसके लिए रोना छोड़ दो             गीता का 11वां उपदेश यह है की जिंदगी में अगर खुश चाहते हो तो मन की गुलामी का त्याग कर दो कई लोग कहते हैं की हम करना तो बहुत कुछ चाहते हैं लेकिन कुछ कर नहीं पाते है , इसके बारें में हमें भी सब कुछ पता  है की क्या करने से हमारी जिंदगी बेहतर हो सकती हैं ,लेकिन फिर भी हम कुछ कर नहीं पाते हैं और न ही  समझ पातें हैं ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि आदमी अपने मन का  गुलाम बन चुका होता हैं हम सब जानते हैं की कुछ लोग  अपनी जीब का  स्वाद तक नहीं छोड़ पाते फिर कहते हैं की शारीरिक रूप से  फिट नहीं हो पाते हैं हमे सक्सेस नहीं मिल रही है क्योंकि जो आपको करना चाहिए वो आप करते नहीं है क्योकि आपका मन सब कुछ समझकर भी आपको वो करने नहीं देता इसलिए जिंदगी में अगर आगे बढ़ाना है तो मन से चलना छोड़ दो क्योकि जो  आपके लिए सही है वो आपको करना ही पड़ेगा                       १२- ज़िन्दगी में अगर खुशी चाहते हो तो मन की गुलामी का त्याग कर दो                                             गीता का 12वां उपदेश यह है की जो आपका है वो आपको मिलकर ही रहेगा और जो आपको नहीं मिला है उसके लिए रोना छोड़ दो आप जिसके लिए जितना रोओगे  वो चीज आपसे उतना दूर जाएगी और जो चीज सच में आपकी है कही ना कही  से आपके पास जरूर पहुंच जाएगी इसलिए जो आपको जिंदगी में हासिल नहीं हो रहा उसका पछतावा करना  बिल्कुल बंद  कर दो      १३-जितना संसार से प्रेम लगाओगे उतना ही जीवन में दुख और पीड़ा का अनुभव करोगे                               गीता का 13वां उपदेश  यह है की आप संसार से जितना प्रेम लगाओगे उतना ही जीवन में दुख और पीड़ा का अनुभव करोगे         १४- जिस इंसान को बात बात पर क्रोध आता है सुख और शांति उसके जीवन में कभी नहीं आते                  गीता का 14वां उपदेश यह है की जिस इंसान को बात-बात पर क्रोध आता है सुख और शांति उसके जीवन में कभी नहीं आ सकते है क्योंकि जो इंसान बहुत ज्यादा क्रोधी होता है  उसके सारे मित्र उसे छोड़कर चले जाते हैं वो मन में भी कुड्ता रहता  है वह अपने मन दर्द और तकलीफ लेकर ही जीता है ज्यादा गुस्सा करके ज्यादा क्रोध करके जो भी आपके पास है आप उसे भी नष्ट कर देते है  इसलिए अपनी जिंदगी में अगर शांति चाहते हो तो बात बात पर गुस्सा करना छोड़ देना चाहिए                ५-चाहे किसी की मदद कर सको या ना कर सको पर जान बूझकर कभी किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिए   गीता का 15 उपदेश ये है की चाहे आप किसी की मदद करो या ना करो लेकिन जानबूझकर कभी किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिए क्योंकि जब किसी का दिल आपकी वजह से दुखता है तो याद रखना की आपको भी वो दर्द एक दिन जरूर मिलेगा                      १६- जो दुख में आपका साथ दे वही आपका अपना है बाकी सब पराये हैं।                                                    गीता का 16वां उपदेश यह  है की  जो मुश्किल वक्त में या  जो दुख के समय में आपका साथ दे सिर्फ वही आपका अपना है बाकी सब पराये  हैं अपनेपन का नाटक करने वाले और बड़ी बड़ी बातें करने वाले  बहुत लोग होते है लेकिन जब सच में आपकी जिंदगी में तकलीफ आती है  तब ही आपको समझ में आ जाएगा की आपका साथ देने के लिए कौन खड़ा है क्योंकि दुख के  समय पर सारे लोग भाग जाते हैं क्योंकि लोगों को पता होता है की  यह व्यक्ति हमारे पास आया तो हमसे मदद ही मांगेगा हमे  कुछ दे नहीं पाएगा  लोग आपसे सिर्फ तभी रिश्ता रखते हैं की आप उन्हें कुछ दे सकते हैं आपसे उन्हें कुछ फायदा हो सकता है लेकिन जब लोगों को यह पता चल जाता है की उनको आपसे कोई फायदा नहीं होने वाला बल्कि उनको आपकी मदद करनी पड़ेगी तो वो आपको देखकर दूर से ही भाग जाते हैं इसलिए जो आपके मुश्किल वक्त में  आपके साथ खड़ा हो जाए सिर्फ वही आपका अपना होता है बाकी इस दुनिया में सब पराए हैं                                     १७ जो होता है अच्छे के लिए होता है जो हो रहा है वो भी अच्छे के लिए हो रहा है और जो होने वाला  होगा वो भी अच्छे के लिए ही होगा।                                    गीता का 17वां उपदेश् यह  है की जो कुछ भी होता है अच्छे के लिए होता है जो हो रहा है वो भी अच्छे के लिए हो रहा है और जो आने वाले भविष्य में होगा वो भी अच्छे के लिए होगा हालांकि ये बहुत गहरी बात है  कुछ चीज जिंदगी में ऐसी होती हैं जिससे हमें लगता है की मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ मेरे साथ ही होना था यह सब लेकिन जब वो वक्त गुजर जाता है तो  एक दिन हमको समझ आता है की अगर हमारे साथ यह सब नहीं होता तो आज हम इस मुकाम पर नहीं होते अगर मेरे साथ यह सब नहीं होता तो शायद हमारी जिंदगी और भी अच्छी हो सकती थी इसलिए अगर हमको यह समझ में आ जाए की जिंदगी में जो कुछ हो रहा है वह सब अच्छे के लिए हो रहा है तो हम जीवन में हमेशा खुश रहेंगे  १८  हर काम को समझदारी से करना ही योग है योगः कर्मसु कौशलम् श्री कृष्ण उपदेश                    गीता का 18वां उपदेश यह है की हर काम  को समझदारी से करना ही योग होता है कर्म   ही कौशल है मित्रो  कई लोग काम  तो करते हैं लेकिन उन्हें हासिल कुछ नहीं होता बहुत लोग कहते हैं की हम बहुत मेहनत करते हैं तब भी जिंदगी में सफलता हासिल नहीं हो रही है जबकि  सही तरीके से समझ के साथ कर्म  करने से आपको जिंदगी में सफलता जरूर मिलेगी                                 १९ ज़िन्दगी में कभी किसी चीज की अति मत करना गीता का 19वां उपदेश यह है की कभी भी किसी भी चीज की अति  नहीं करनी चाहिए किसी से प्रेम भी हद से ज्यादा मत करना किसी से नफरत भी हद से ज्यादा मत करना हद से ज्यादा मीठा भी खराब, हद ज्यादा कड़वा भी खराब, हद से ज्यादा आराम ,हद से ज्यादा खाना भी आपको बीमार कर देगा और हद से ज्यादा जगना  भी आपको बहुत नुकसान पहुंचाएगा  , जीवन को संतुलन के साथ जीना चाहिए                २०  जिसे आप सबसे ज्यादा महत्व दोगे वो आपको कभी महत्व नहीं देगा                                                गीता का 20वां उपदेश यह है की जिससे आप सबसे ज्यादा महत्व दोगे वो आपको कभी महत्व नहीं देगा आपने कभी गौर किया है की आपका अपमान कौन लोग करते हैं आपका अपमान सिर्फ वही लोग करते हैं जिससे आप सबसे ज्यादा महत्व देते हैं दूसरों की इज्जत करना अच्छी बात है पर दूसरों की अगर बहुत ज्यादा इज्जत करोगे तो उनकी नजर में आपकी ही इज्जत खत्म हो जाती है इसलिए लोगों को इज्जत उतनी ही देनी चाहिए जितना वो हजम कर सकें हद  से ज्यादा इज्जत देना आपकी ही बेइज्जती करवा सकता है                    २१ अगर आप अपनी वैल्यू ख़ुद नहीं करोगे ,तो कोई भी आपकी वैल्यू नहीं करेगा                                      २२ किसी पर भी आंख बंद करके भरोसा मत करना   गीता का 22वां उपदेश यह  है की किसी  पर भी आंख बंद  करके भरोसा मत करना जैसे की महाभारत की कथा में दुर्योधन ने कितनी बार षड्यंत्र  करके पांडवों को मारने की कोशिश की आग  में जलाने  की कोशिश की और पांडव  धर्म के मार्ग पर चलने वाले  बार-बार उसकी बातो में आ जाते थे यह बात और है की ईश्वर उनकी रक्षा कर रहे थे पर जिसे वह अपना भाई समझ रहे थे जिसे वो अपना सागा समझ रहे थे जिसमें वो भरोसा कर रहे थे वही उनकी मृत्यु करवाना चाहता था इसीलिए भरोसा करते समय अपनी आंखें जरूर खोलकर रखना चाहिए             २३ जिसके साथ सत्य एवं  ईश्वर की शक्ति है, चाहे सारी दुनिया उसके खिलाफ हो जाये लेकिन अंत में जीत उसी की ही होती है यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम              गीता का 23वां उपदेश यह है की  है जिसके साथ सत्य और ईश्वर की शक्ति है चाहे सारी दुनिया उसके खिलाफ हो जाए लेकिन अंत में जीत सत्य  की ही होती है श्रीमद् भागवत गीता में 18 अध्याय  और 700 श्लोक हैं गीता का आखिरी श्लोक है यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम  धृतराष्ट्र बार-बार संजय से पूछता था की बताओ युद्ध में कौन जीत रहा है कौन हार रहा है क्योंकि उसे विश्वास था की महापराक्रमी  भीष्म पितामह मेरे पक्ष में है गुरु द्रोणाचार्य वह मेरे पक्ष में है कर्ण  मेरे पक्ष में है तो हमें कौन हरा सकता है लेकिन संजय ने धृतराष्ट्र से कहा की जहां पर ईश्वर है जहां पर सत्य है हमेशा वही जित होती  है चाहे आपके पास कितनी भी शक्ति क्यों ना हो लेकिन लेकिन सत्य और ईश्वर जिसके साथ खड़े हो तब उसे दुनिया में कोई भी नहीं हरा सकता है                २४ जीवन में लड़ाई झगड़े से बचना चाहिए। लेकिन जब बात आपके चरित्र सम्मान और अधिकार की हो तो लड़ना भी चाहिए                                                  गीता का 24वां उपदेश यह  है की जीवन में लड़ाई झगड़ा करने से बचाना चाहिए लेकिन जब बात आपके चरित्र सम्मान और अधिकार की हो तो लड़ना भी चाहिए अर्जुन भी महाभारत का युद्ध नहीं करना चाहता था  क्योंकि सामने उसके अपने खड़े थे लेकिन श्री कृष्ण ने उसे उपदेश दिया की यहां पर बात लड़ाई की नहीं है तेरे सम्मान की है तेरे चरित्र की है तेरी अधिकार की है क्योकि द्रौपदी के साथ उन्होंने भारी सभा में अपमान किया उसे निर्वस्त्र  करने की कोशिश करके इतना बड़ा अधर्म किया है वो तुम्हें कभी सहाना नही चाहिए इसलिए बात जब आपके चरित्र पर आ  जाए, आपके सम्मान पर आ  जाए तो चाहे वो अपना ही क्यों ना हो आपको उसके साथ जरूर लड़ना चाहिए २५  चाहे कितना भी बुरा वक़्त आ जाये लेकिन जीवन में जो हिम्मत नहीं हारता वो फिर से सब कुछ हासिल कर लेता है।                                                 गीता का 25वां उपदेश  है की चाहे कितना भी बुरा  वक्त आ  जाए लेकिन जो इंसान जिंदगी में हिम्मत नहीं हारता वो सब कुछ हासिल कर लेता  है जब पांडव लोग जुऐ में सब कुछ हार  गए उनको 12 साल के लिए वनवास मिला और एक साल के लिए अज्ञातवास मिला उन्होने भिक्षा मांग करके अपनी जिंदगी का गुजर बसर किया था इतना मुश्किल वक्त झेलने के बाद भी आखरी में विजय उन्हीं की हुई थी  ऐसे ही आपकी जिंदगी में कितना ही मुश्किल वक्त क्यों ना आ  जाए लेकिन आपके अंदर अगर हिम्मत है तो जीत आपकी ही होगी                                           २६  जो किसी और का है उस पर कभी अधिकार मत ज़माना, कब्जा मत करना                                          गीता का 26वां उपदेश यह है की जो किसी और का है उसे पर कभी अधिकार मत जमाना कभी कब्जा  मत जमाना ,जब शकुनी ने षड्यंत्र करके पांडवों को हस्तिनापुर से अलग करवा दिया एक खांडव प्रस्थ  का राज दे दिया जहां की भूमि भी बंजर थी जहां कुछ नहीं हो सकता था लेकिन पांडवों ने उसे  इतना सुंदर नगर बनाया इतना वैभवशाली बनाया की हस्तिनापुर भी उसके आगे फीका लगाने लगा और उनके  वैभव व  सुख को देखकर दुर्योधन अंदर ही अंदर जलता था उसने कई बेइमानिया करके षड्यंत्र करके उनका वो खांडव प्रस्थ भी छिन लिया जो चीज उसकी नहीं थी उस पर कब्जा कर लिया जिसका आखिर में परिणाम यही हुआ की जो चीज उसके पास थी वो भी उसके पास नहीं रही इसलिए जो आपका नहीं है कभी उसे पर अधिकार नहीं जमाना चाहिए              २७  वही इंसान ज़िन्दगी में सफल माना जाएगा जो अंदर से हमेशा खुश रहता है, गीता का 27वां उपदेश यह है की वही इंसान जिंदगी में सफल माना जाएगा जो अंदर से हमेशा खुश रहता  है बाहर से तो सब खुश दिखाई देते हैं लेकिन अंदर से इंसान अशांति से भरा रहता  है बहुत पैसा कमा लिया कामयाबी हासिल कर ली लेकिन वो कामयाबी असली नहीं है असली कामयाबी तब मनी जाएगी जब आपका मन खुश रहता  हो    २८  जैसा अन्न खाओगे वैसा ही आपका मन और बुद्धि होगी ,                                                              गीता का 28वां उपदेश यह है की आप जैसा अन्न खाओगे  वैसा ही आपका मन और आपकी बुद्धि होगी जैसा कर्म करोगे वैसा ही आचरण करोगे सात्विक अन्न खाओगे  तो आपका मन भी सात्विक होगा और सात्विक व्यवहार भी करोगे सोच भी आपकी अच्छी होगी तामसिक आहार  करोगे तो आपकी बुद्धि भी वैसी होगी , क्या खाना चाहिए क्या नहीं खाना चाहिए, जो मनुष्य सात्विकता से भोजन करता है सात्विक भजन करता है उसे जीवन में शांति और सुख जरूर मिलते हैं                        २९  बुरा इंसान कभी अपनी बुराई नहीं छोड़ेगा चाहे आप उसके साथ कितना भी अच्छा चलो वो आपको तकलीफ ही देगा इसीलिए जो जैसा है उसके साथ वैसा ही चलना चाहिए                                                गीता का 29वां उपदेश है की बुरा  इंसान कभी अपनी बुराई नहीं छोड़ेगा चाहे आप उसके साथ कितना भी अच्छा करो  वो आपको तकलीफ ही देगा है इसलिए जो जैसा है आप उसके साथ वैसा ही व्यवहार करो बुरे इंसान के साथ आप कितना भी अच्छा बन जाओ वो कभी अच्छा नहीं बनने वाला है दुर्योधन जब जंगल में पांडवों को मारने के लिए गया था लेकिन वहां पर भीलों ने दुर्योधन को पकड़ लिया उसका मित्र कर्ण भी उसे छोड़कर भाग गया भील लोग दुर्योधन को मार देना चाहते थे लेकिन युधिष्ठिर अपने भाई की रक्षा करने के लिए वहां पहुंच गया उसके जीवन की रक्षा की लेकिन उसके बाद भी दुर्योधन  हमेशा पांडवों का नुकसान ही करता रहा                        ३०.समय की कद्र करो                                             गीता का 30वां उपदेश  है की जो इंसान अपने अनमोल समय की कदर नहीं करता समय उसकी  कदर कभी नहीं करता उसकी जिंदगी का सारा समय व्यर्थ में ही समाप्त हो जाता है क्योंकि समय ही आपका जीवन है अगर आप समय को व्यर्थ ही नष्ट करते रहोगे  तो आपको जीवन में कुछ भी हासिल नहीं होगा अगर कुछ जिंदगी में कुछ पाना  चाहते हो तो समय की कद्र  जरूर करे समय आपकी कद्र करेगा दोस्तो भगवान श्री कृष्ण के ये अनमोल बाते अगर आपको अच्छी लगी हो तो कमेंट्स मे जयश्री राधे कृष्ण अवश्य लिखे




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