दोस्तो जन्म से लेकर देहत्याग तक भगवान कृष्ण के जीवन की लगभग हर घटना में जीवन का कोई सूत्र है युद्ध भूमि पर दिया गया गीता का उपदेश संसार का श्रेष्ठतम ज्ञान माना जाता है
मैंनेजमेंट मास्टर कहें या जगतगुरु, गिरधारी कहें या रणछोड़, भगवान कृष्ण के जितने नाम हैं, उतनी ही कहानियां भी है ,जीवन जीने के तरीके को अगर किसी ने परिभाषित किया है तो वो हैं कृष्ण, श्रीमद भगवत गीता को दुनिया मे सबसे ज्यादा पढ़ा गया है श्रीमद भगवत गीता का ज्ञान उसी व्यक्ति को समझ मे आयेगा,जो अपने जीवन में आगे बढ़ना चाहता है,वास्तविकता में भागवत गीता मनुष्य के जीवन को हर तरह से बेहतर बनाती हैं,इसलिए जो इंसान जीवन में कुछ करना चाहता है उसे ही गीता का ज्ञान समझ में आएगा,लेकिन जो सिर्फ मनोरंजन या सिर्फ जानकारी बढ़ाना चाहता है तो वह गीता के असली अर्थ को कभी समझ नहीं पाएगा,दोस्तों वास्तविकता में भागवत गीता का असली काम आपकी हर समस्या का हल कर देना आपके हर प्रश्न का उत्तर आपको देना और आपको जिंदगी में आगे बढ़ाने के लिए सही रास्ता दिखाना है,आज हम श्रीमद् भागवत गीता की शिक्षाओं के बारे में चर्चा करेंगे तो दोस्तों एक बार सच्चे दिल से कमेंट में जय श्री कृष्ण जरूर लिखें,
श्रीमद् भागवत गीता के पहली शिक्षा यह है कि -यह कलयुग अर्थ और काम का योग है,इसका मतलब आज के युग में लोग आपसे सिर्फ तभी रिश्ता रखेंगे आपसे सिर्फ तभी प्रेम से बात करेंगे या तो उनका आपसे कोई काम बनता हो या आपसे किसी को पैसे मिलते हैं,आज के समय में किसी के मीठे शब्दों से उसके चरित्र को अच्छा मत समझ लेना मीठे शब्द सिर्फ आपको फसाने के लिए बोले जाते हैं,जैसे ही किसी का स्वार्थ पूरा हो जाता है फिर पता चलता है कि उसे इंसान का व्यवहार व जुबान कैसी है,क्योंकि इंसान को छलने के लिए मीठे शब्दों से बड़ा और कोई हथियार नहीं होता है,अपना काम बनाने के लिए लोग आपकी तारीफ करेंगे अपना काम बनाने के लिए लोग आपको अपना भी कहेंगे अपना बनाएंगे,अपने काम को निकालने के लिए लोग आपसे रिश्ता भी जोड़ेंगे, लेकिन अगर आप उनके इस व्यवहार को सच समझकर इसमें फंस जाएंगे तो आगे चलकर आपके दिल को बहुत बड़ा धक्का लगेगा कहते हैं वक्त आने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है वास्तविकता में यह वही युग चल रहा है जहां लोग अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हैं,एक शहर में एक गुरु जी का नाम बहुत प्रसिद्ध था,सब लोग उनको बहुत मानते थे तो वहां का एक व्यापारी उसे गुरु जी के पास गया और गुरुजी से कहने लगा कि मुझे अपना शिष्य बना लो,मुझे दीक्षा दे दो तो गुरुजी ने उसे व्यापारी को दीक्षा देकर अपना शिष्य बना लिया, दूसरे दिन उस व्यापारी ने अपने गुरु जी की तस्वीर अपनी दुकान पर लगा दी,जब लोग वहां से गुजरने लगे तो वह लोगों से कहने लगा कि आप मुझे सामान खरीदो मैं सबसे अच्छा और सबसे सस्ता सामान बेचता हूं,मैं अपने गुरुजी की कसम खाकर कहता हूं कि मैं आपसे कोई लाभ नहीं कमा रहा हु,धीरे-धीरे यह बात गुरुजी के कानों तक पहुंची की कोई व्यक्ति है जो आपका नाम लेकर आपकी कसमें खाकर लोगों को सामान बेचता है लोगों को बेवकूफ बनाता है,और लोग उसके पास इसलिए चले जाते हैं क्योंकि वह आपका शिष्य है,और लोग उस पर भरोसा कर लेते हैं कि अपने गुरु की कसम खाता है तो यह व्यक्ति कैसे यह धोखा दे सकता है,एक दिन गुरूजी उसकी दुकान पर गए तो गुरुजी ने जाकर देखा की वास्तविकता में यह मेरा नाम लेकर लोगों को सामान बेचता है,तो गुरु जी ने उस व्यापारी से कहा कि तुम मेरे शिष्य होकर लोगों के साथ धोखा क्यों करते हो तुम्हें तो अच्छे काम करने चाहिए तो वह व्यापारी बोला मुझे तो गुरु शिष्य कुछ समझ नहीं आता है,मुझे सिर्फ अपना फायदा समझ आता है,मैंने देखा कि सारा शहर आपको मानता है तो मुझे समझ आया कि आपको गुरु बनाने से मुझे बहुत फायदा मिलेगा,मेरी कोई धर्म में कोई रुचि नहीं है मेरे फायदे में रुचि है,और जब से मेने आपका नाम लेना शुरू किया है,आपका नाम की कसमें खाने शुरू की है ,तब से मेरा व्यापार और बढ़ गया है,यह सुनकर गुरुजी को बहुत धक्का लगा कि कैसा समय आ गया है, कैसा युग आ गया है,कि लोग अपने फायदे के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं,यह कैसी वक्त की विडंबना है कि लोग अपने मां-बाप तक को नहीं छोड़ते अपने गुरु तक को नहीं छोड़ते इंसान इंसान को नोच कर खा रहा है,हर इंसान कोशिश करता है कि सिर्फ मेरा फायदा होना चाहिए चाहे सामने वाले का कितना ही नुकसान क्यों न हो जाए,आज के युग में अगर आप किसी को अपना फायदा उठाने दोगे तो लोग वह मौका कभी नहीं छोड़ने वाले हैं,इसलिए किसी के मीठे शब्दों में किसी की अपनेपन की बातों में कभी मत फसना बल्कि आंखें खोलकर इंसान को परखना,सबसे ज्यादा धोखा इंसान इंसान के साथ अपने मन की आड़ में करता है कि तुम तो मेरे अपने हो तुम तो मेरे खास हो तुम तो मेरे दिल के करीब हो तुम्हारे साथ में ऐसा कैसे कर सकता हूं,कभी ऐसा हुआ है क्या की जिसे आप जानते ही नहीं हो वह आपको चोट पहुंचा कर गया हो,अक्सर आपको चोट वही लोग पहुंचते हैं जो आपके अपने होते हैं जो आपके दिल के करीब होते हैं गीता का इतना अद्भुत ज्ञान महाभारत की लड़ाई पराए लोगों में नहीं थी यह भाइयों की लड़ाई थी एक ही परिवार की लड़ाई थी और करोड़ों लोग उस लड़ाई में मारे गए क्योंकि अपना ही अपने का सुख नहीं देख पाया,अपना ही अपने की खुशी से जलता रहा,आपने कभी गौर किया की आप किसी को भी कह दोगे कि वह आपके लिए खास है आप उसे अपना मानते हैं,देखना आज नहीं तो कल वह आपको चोट जरूर पहुचायेगा है,वक्त लगता है एक दिन में बात समझ नहीं आती लेकिन एक दिन जरूर समझ आती है कि यहां कोई अपना नहीं है इस शिक्षा का उद्देश्य यह नहीं है कि हम लोगों से नफरत करने लग जाएं या लोगों से गलत व्यवहार करने लग जाए इस शिक्षा का यही अर्थ है कि आप लोगों के भरोसे पर मत बैठे रहो,आप किसी से यह उम्मीद लगाकर मत बैठ जाओ कि वह आपका जिंदगी भर साथ देगा आपका साथ कभी नहीं छोड़ेगा,दोस्तों सब साथ छोड़ते हैं,आपकी जिंदगी में कई लोग आएंगे और कई लोग जाएंगे यह जो आप अपने दिल में बिठाकर बैठ जाते हैं की यह मेरा हमेशा साथ देगा यह बात कभी अपने दिमाग में मत आने देना,हमेशा के लिए हमारा शरीर भी हमारे साथ नहीं रहेगा वह भी एक दिन छुट जाता है तो आप लोगों से क्या उम्मीद लगते हो,याद रखना किसी के साथ अगर बहुत ज्यादा मोह लगाओगे तो दुख सहना ही पड़ेगा, लेकिन अगर आप इस संसार में सब लोगों से बाहर से चलोगे ऊपर ऊपर से चलोगे तो आपको कोई चोट नहीं पहुंचा सकता है,
श्रीमद् भागवत गीता के दूसरी शिक्षा यह है कि -जो इंसान स्वयं से खुश नहीं वह दुनिया में किसी भी चीज से खुश नहीं हो सकता,आज के समय में अधिकतर लोग खुशी के लिए भटकते रहते हैं,उनकी खुशी उनके वर्तमान में नहीं होती है,जिस इंसान की खुशी इस पल में नहीं है वह खुशी के लिए हमेशा भटकता रहता है जो इंसान अपने आप से ही खुश नहीं है,अगर वह किसी रिश्ते से भी जुड़ेगा तो उसे रिश्ते में भी उसे दुख ही मिलेगा,अगर वह किसी काम से जुड़ेगा तो उसे काम में भी दुखी ही मिलेगा,वह जहां जाएगा,अपने साथ अपने दुख की ऊर्जा साथ ले जाएगा,याद रखना जगह बदलने से रिश्ते बदलने से खुशी नहीं आती,लेकिन इंसान खुद को बदल दे तो जिंदगी में खुशियां जरूर आती है,जो लोग खुद से खुश नहीं होते वह खुशी के मौके पर भी कोई न कोई दुख ढूंढ लेते हैं,वास्तविकता में खुश रहना और दुखी रहना एक दिमाग की प्रोग्रामिंग है,एक मेंटल ट्रेनिंग है,अगर आपने अपने दिमाग को बार-बार हर चीज में उदास होने की ट्रेनिंग दे रखी है दुखी होने की ट्रेनिंग दे रखी है तो धीरे-धीरे आपका दिमाग खुश होना ही भूल जाएगा,लेकिन अगर आपने अपने दिमाग को छोटी-छोटी बातों पर खुश होने की आदत डाली है तो आप जिंदगी के हर पल में खुशियों को जी पाएंगे इतनी सी बात अगर किसी को समझ में आ जाए की खुशियां और दुख हमारे दिमाग की प्रोग्रामिंग से चलती है,तो आप अपनी जिंदगी को खुशहाल बना सकते हो या फिर आप अपनी जिंदगी को दुखों के अंधेरे में धकेल सकते हो इसीलिए इसे समझना बहुत जरूरी है जीवन में अगर खुश रहना है तो छोटी-छोटी चीजों में भी खुशियों को देखने की नजर होनी चाहिए नहीं तो बड़ी से बड़ी खुशी में भी आपका मन दुख ही ढूंढ लेगा,
श्रीमद् भागवत गीता की तीसरी शिक्षा यह है कि- इस दुनिया में हारे हुए इंसान की,तकलीफ में पड़े हुए इंसान की,कोई मदद नहीं करता है,और अगर कोई इंसान थोड़ा सा भी सफल हो जाए तो उससे कोई खुश नहीं होता है,अपना दुख और अपनी खुशी किसी को मत बताओ,अगर खुश रहना है तो छोटी-छोटी चीजों में भी खुशियों को देखने की नजर होनी चाहिए,आप अगर अपने दुख को दुनिया के आगे शेयर करोगे,लोगों के आगे शेयर करोगे तो लोग आपसे दूर भागना शुरू कर देंगे,क्योंकि उन्हें पता है कि जितना इसके पास रहेंगे उतने इसके दुखड़े सुनने पड़ेंगे और यह कभी भी हमसे मदद मांगेगा,इसलिए बेहतर है की इससे दूर ही रहो,और जैसे ही आप सफल हो जाते हैं तो लोगों को वह भी अच्छा नहीं लगता है,यह दुनिया बड़ी अजीब है,दुखी इंसान की मदद नहीं करती और जो इंसान खुश है उसे खुश भी नहीं रहने देते हैं खुशी से भी लोगों को तकलीफ होती है अपने हजारों बार यह सुना होगा कि दुख में कोई किसी के साथ ही नहीं होता है,तो भी लोग दूसरों को जाकर अपने दुख बताते हैं,दूसरों से उम्मीद लगाते हैं कि वह उनकी मदद करेंगे,कोई क्यों करेगा किसी की मदद और क्यों खुद को इतना कमजोर बनाना की दूसरों की मदद की जरूरत पड़ जाए,कई लोगों को आदत होती है जब तक अपनी सफलता के बारे में अपनी खुशियों के बारे में 10 - 20 लोगों को नहीं बता देंगे तब तक उनका मन भरता ही नहीं है,इसीलिए जब आप अपनी खुशियां लोगों को बार-बार बताते हो तब आपके बनते हुए काम भी रुक जाते हैं बनते हुए काम भी बिगड़ जाते हैं क्योंकि काम बनने से पहले ही आप अपनी योजना के बारे में सबको बता देते हो,जब तक आप सफल नहीं हो जाते तब तक किसी को कुछ मत बताओ,जब तक आपकी योजनाएं पूरी नहीं होती तब तक किसी को मत बताओ और जिस दिन आप सफल हो जाओगे,जिस दिन आपकी योजनाएं पूरी हो जाएगी तब आपको बताने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, लोगों को अपने आप आपकी सफलता दिख जाएगी इसलिए चाहे आपकी खुशी हो चाहे आपका दुख हो उसे अपने तक ही रखना चाहिए,
श्रीमद् भागवत गीता की चौथी शिक्षा यह है- कि मनुष्य का आहार सात्विक और संतुलित होना चाहिए, कलयुगी आदमी कहीं भी कुछ भी खा लेता है जिस इंसान को यह समझ मे नहीं आता है की उसे क्या खाना चाहिए,कितना खाना चाहिए कहां खाना चाहिए कैसे खाना चाहिए वह जीवन की ऊंचाइयों को कभी नहीं छू सकता,आजकल अधिकतर लोग बस स्वाद के पीछे पागल हो गए हैं कई लोग तो कहते हैं हमारे शहर से 50 किलोमीटर दूर एक जगह है वह खाने का टेस्ट बहुत अच्छा है दिल्ली से 1 घंटे दूर पराठे बहुत अच्छे मिलते हैं,वहां रेगुलरली पराठे खाने जाते हैं 1 घंटा जाना 1 घंटा आना सिर्फ एक छोटी सी जुबान के स्वाद के लिए,याद रखना जो लोग कहीं से भी कुछ भी खा लेते हैं उन्हें इस बात की समझ होनी चाहिए कि उस भोजन में उस आहार में पवित्रता है ना प्रेम है,उस व्यक्ति को आपसे कोई प्रेम नहीं है और उस आहार को बनाने में कोई पवित्रता का ध्यान नहीं रखा जाता है,लेकिन लोगों को किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है,बस जुबान पर टेस्ट आना चाहिए फिर चाहे हमको 10 दिन का सड़ा हुआ खाना खिलाया जाए,बस टेस्ट अच्छा होना चाहिए चाहे उस खाने में गंदगी भरी हो,लेकिन हमारी जुबान को इसका टेस्ट अच्छा लगना चाहिए, आज के समय में लोगों के खाने-पीने का कोई नियम नहीं है, कोई धर्म नहीं है,सुबह हो,दिन हो,शाम हो,जब मन किया,तब खाना है,चाहे शरीर को बीमार ही क्यों ना हो जाए,तो भी खाना है,चाहे बॉडी को सूट भी नहीं कर रहा तो भी खाना है,कमाल के लोग हैं जब रास्ते पर गाड़ी चलाते हैं तो ट्रैफिक में ऐसे भागते हैं जिसे दुनिया में कहीं कोई भूकंप आया हो,एक सेकंड भी लोगों से रुका नहीं जाता है गाड़ियां एक दूसरे के ऊपर चढ़ा देनी है बस,हमें भगाना है,लेकिन जब खाने की बात आती है तो लोग कई घंटे लाइनों में खड़े हो जाते हैं आज के समय में लोगों ने जुबान के स्वाद को बहुत ज्यादा इंपोर्टेंस दे रखी है,जैसे खाना ही उनकी जिंदगी का लक्ष्य है,लेकिन श्रीमद् भागवत गीता सिखाती है कि इंसान जैसा आहार खाता है वैसा ही उसका मन होता है वैसे ही वह काम करता है वह वैसे ही एक्सपीरियंस को फील करता है,श्री कृष्ण कहते है,सात्विक अन्न से मन सात्विक होता है शांत होता है खुश रहता है,और जो तामसिक आहार करते हैं उनका मन चिड़चिड़ा होने लगता है,ऐसे लोगों को बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता है,मन कभी शांत नहीं रहता है जो खाना आप अपने शरीर में डाल रहे हैं उसे हल्के में मत लेना वही आपका विचार बनने वाला है और वही आपका अनुभव बनने वाला है,श्रीमद् भागवत गीता के छठे अध्याय में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को भोजन के बारे में विस्तार से बताया है की भोजन तीन प्रकार का है सात्विक तामसिक और राजसिक,सात्विक आहार आपके शरीर की उम्र को बढ़ाता है,आपके मन को सुख देता है,आपके माइंड में आपको सेटिस्फेक्शन देता है जीवन को खुशी देता है और ऐसा आहार रसमय में होता है,राजसिक आहार दुख शोक और रोग उत्पन्न करने वाला होता है,ज्यादा गर्म तीखा और जलन पैदा करने वाला खाना रजोगुणी आहार कहा जाता है,और जो खाना जीवों की हत्या करके बनाया गया है,अपवित्रता से बनाया गया है,बहुत ज्यादा गर्म बहुत ज्यादा तीखा और खट्टा हो या जिसमें नशीले पदार्थ डाले जाते हैं,ऐसा खाना तमोगुणी आहार कहा गया है,और इनमें से जैसा खाना खाएंगे वैसे ही आपकी बुद्धि होगी वैसे ही आपका जीवन बनने वाला है इसलिए श्रीमद् भागवत गीता यह सिखाती है कि अगर आप जीवन में खुश रहना चाहते हो तो हमेशा सात्विक और संतुलित आहार ही करना चाहिए,
श्रीमद् भागवत गीता की पांचवी शिक्षा यह है कि-खुद को ऐसा कभी मत बनाओ की लोग आपका इस्तेमाल करके चले जाए, खुद को ऐसा कभी मत बनाओ जो लोग आपको चोट पहुंचा कर चले जाएं अपने आपको कभी भी लाचार रखकर नहीं जीना चाहिए,लोग आपको अच्छा नहीं मानेंगे बल्कि आपका फायदा उठाएंगे आपको कैसा बनाना है,यह आप पर निर्भर करता है,अगर लोग आकर के आपको आसानी से चोट पहुंच जाते हैं आपका का इस्तेमाल करके चले जाते हैं तो आपको गौर करना चाहिए कि ऐसा क्या कारण है कि लोग आपको आसानी से चोट पहुंचा देते हैं,क्योंकि कई लोग दुनिया में ऐसे होते हैं जिससे बात करने में भी लोगों को डर लगता है,जिस इंसान का मन मजबूत है,उसे कोई चोट नहीं पहुंचा सकता लेकिन जो इंसान मन से ही कमजोर है उसे चोट पहुंचाना बहुत आसान हो जाता है,इसलिए यह बहुत जरूरी है आपका मन मजबूत होना चाहिए आपके विचार मजबूत होने चाहिए कमजोर मन और कमजोर विचारों के साथ जिओगे तो जगह-जगह आपको चोट लगती रहेगी,इसलिए अपने आप को ऐसा कभी मत बनाओ की आपको कोई भी चोट पहुंचा कर चला जाए,
श्रीमद् भागवत गीता का छठवी शिक्षा यह है कि- मनुष्य को दुष्कर्म का त्याग करके हमेशा कर्म करते रहना चाहिए,जब मनुष्य किसी भी काम को सिर्फ और सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए करता है तब वह अपने स्वार्थ की पूर्ति करते-करते कब दुष्कर्मों में लग जाता है कब बुरे कर्मों में लग जाता है उसे पता ही नहीं चलता लेकिन जब काम को करते हुए मन में निस्वार्थ भाव आता है लालच का भाव नहीं आता है तो वह इंसान बुरे कर्मों से बचा रहता है,क्योंकि लालच ऐसी चीज है जो अच्छाई और बुराई की समझ खत्म कर देती है,सही गलत का फर्क मिटा देती है,इसलिए जो इंसान अपना लालच अपना स्वार्थ नहीं छोड़ सकता वह कभी किसी का भला नहीं कर सकता है ,ऐसा इंसान समाज की सेवा नहीं कर सकता है ना है लोगों की सेवा कर सकता है, ना ही अपने देश की सेवा कर सकता है,क्योंकि उस इंसान का लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ अपना फायदा निकलना होता है,सिर्फ अपना पेट भरना होता ह,एक लालच से भरा हुआ प्राणी जुर्म करने में भी देर नहीं करता है,कोई अपराध करने में भी देर नहीं करता है,इसलिए जीवन में अपने स्वार्थ से थोड़ा ऊपर उठकर जीना चाहिए कर्म का चक्कर ऐसा है,जिसने जो किया है उसका फल उसे जरूर मिलता है,जिसने जो बीज बोया है,उसका फल उसे जरूर मिलेगा,अगर किसी ने कांटे बौए हैं,तो उसे कांटे ही मिलेंगे,अगर किसी ने फूल बौए है तो जिंदगी भी उसका फूलों की तरह स्वागत करेगी,
श्रीमद् भागवत गीता का सातवी शिक्षा यह है कि -जिस इंसान को अपनी जिंदगी में अपने आसपास की दुनिया में अपने रिश्तों में हमेशा सब कुछ बुरा ही दिखाई देता है,सब कुछ गलत ही दिखाई देता है,ऐसा इंसान बहुत जल्दी ही डिप्रेशन में चला जाता है,जो इंसान अपनी जिंदगी में एक भी खुशी नहीं ढूंढ पाया,खुश रहने का एक भी कारण नहीं ढूंढ पाया उसके हैप्पी हार्मोन धीरे-धीरे कम होने लगते हैं,और अकेलापन उदासी डिप्रेशन उसके जीवन में बढ़ने लगते हैं,माना कि बाहर की परिस्थितियों को आप कंट्रोल नहीं कर सकते,लेकिन उन परिस्थितियों में आपको खुश रहना है या आपको दुखी होना है यह पूरा चुनाव सिर्फ आपका है,कई लोग कहते हैं कि ऐसी परिस्थितियों में कोई कैसे खुश रह सकता है,तो फिर दुखी रहो और अगर दुखी रहना नहीं पसंद तो फिर अपनी परिस्थितियों को बदलने की कोशिश करो और कोई ऑप्शन नहीं है,आपके पास जो परिस्थिति चल रही है उसमें खुश रहो,अगर वह परिस्थिति पसंद नहीं आ रही है तो उस परिस्थिति को बदल दो,लेकिन अगर आप दोनों नहीं कर पा रहे तो आप हमेशा पिसते ही रहेंगे क्योंकि ना तो आप परिस्थिति बदल पा रहे हो, ना ही आप अपने विचार बदल पा रहे हैं,और खुश रहना है तो दोनों में से किसी एक को तो बदलना ही होगा या तो परिस्थिति बदलो या फिर अपने मन के विचार बदलो,और अगर दोनों नहीं बदल सकते तो फिर दुखी रहने के लिए तैयार रहना, श्रीमद् भागवत गीता के आठवीं शिक्षा यह है किसी बेकसूर इंसान के साथ धोखा करना उसका बेवजह जानबूझकर दिल दुखाना,इस दुनिया का सबसे बड़ा पाप होता है,श्री व्यास देव जी जिन्होंने महाभारत की रचना की,18 पुराण की रचना की,उनसे किसी ने पूछा कि आपने इतने सारे शास्त्र लिखे है,इतनी किताबें लिखी है,इतना कोई कैसे पढ़ सकता है,आप इन सारे धर्मग्रंथों का सार बता दो,तो व्यास जी कहने लगे कि मैंने सारे शास्त्रों में कुल दो बातें खास रूप से लिखी है,मेरे लिखे गए सारे शास्त्रों का सार सिर्फ दो वर्णों में समाया है,एक किसी के दिल को खुश करना सबसे बड़ा परोपकार है,सबसे बड़ा धर्म है,और किसी के दिल को दुख पहुचाना,किसी के मन को चोट पहुंचाना,सबसे बड़ा पाप है,
श्रीमद् भागवत गीता की नौवि शिक्षा यह है कि -जब तक आप औरों से सम्मान की उम्मीद करते रहोगे,तब तक आपका अपमान होता ही रहेगा, जब तक आपको यह इच्छा है कि कोई आपकी कदर करें,तब तक आपकी को कोई कदर नहीं करेगा,चाहने वाले का अपमान निश्चित ही होता है,आप कभी गौर करना किसी इंसान को सम्मान की सबसे ज्यादा लालच होती है,वह इंसान जगह-जगह पर खुद को अपमानित महसूस करता है,हालांकि कोई उनका कुछ करता नहीं है लेकिन जब जिस सम्मान को पाने की उम्मीद लगाकर बैठते हैं,उसी की वजह से उन्हें लगता है कि हर जगह हमारा अपमान हो रहा है,कुछ अजीब ही चक्र है जो लोग सम्मान चाहते हैं उन्हें अपमान मिलता है,जो लोग प्रेम चाहते उन्हें छल मिलता है,जो लोग अच्छा व्यवहार चाहते हैं उन्हें गलत लोग मिल जाते हैं,वास्तविकता में सम्मान चाहने और मांगने की चीज नहीं है,वह आपके कर्मों के अनुसार आपको स्वयं मिलता है,प्रेम मांगने की चीज नहीं है वह आपके व्यवहार के अनुसार आपको स्वयं मिलेगा,जब आप इन चीजों को मांगने लगते हो,चाहने लगते हो,तो बदले में आपको सारी उलटी चीजे ही मिलने लगती है,इसलिए जीवन में सम्मान की उम्मीद लोगों से मत रखना,प्रेम की उम्मीद लोगों से मत रखना, और अच्छे व्यवहार की उम्मीद भी लोगों से मत रखना,कई लोग कहते हैं कि हम कम से कम इतना तो डिजर्व करते हैं कि सामने वाला से अच्छा व्यवहार करें,सामने वाला आपसे कैसा व्यवहार करेगा आप उसे कंट्रोल नहीं कर सकते वह उसके लिए पूरी तरह से आजाद है,वह आपके साथ अच्छा व्यवहार करें या बुरा व्यवहार करें,आप उसमें कुछ नहीं कर सकते इसलिए ऐसी चीजों को जानना ही छोड़ दो,जिन पर आपका कंट्रोल नहीं है,अच्छा व्यवहार करना आपके हाथ में है,लोगों को प्रेम करना आपके हाथ में है,लोगों के साथ सम्मान से चलना वह आपके हाथ में है,लेकिन बदले में वही चीज खुद के लिए चाहना वह आपके हाथ में कभी नहीं हो सकता,लेकिन जिस पल आप सम्मान प्रेम और अच्छे व्यवहार को चाहना छोड़ देते है तो प्रकृति अपने आप ही आपको यह सब चीज देना शुरू कर देती हैं
श्रीमद् भागवत गीता की दसवी शिक्षा यह है कि -अगर दुख से छूटना चाहते हो तो जो कुछ जिंदगी में आपको ईश्वर ने दिया है चाहे वह कोई इंसान हो या कोई जॉब हो या घर हो आपके पास जो भी कुछ है उसके लिए दिन में तीन बार ईश्वर का धन्यवाद जरूर करें,क्योंकि जो लोग धन्यवाद के भाव में जीते हैं,उनके जीवन से शिकायत का भाव चल जाता है,और जिसे अपने जीवन में किसी से भी कोई भी शिकायत नहीं है उसके जीवन में दुख टीक ही नहीं सकता है,सिंपल सा गणित है अगर आपके जीवन में हंड्रेड परसेंट धन्यवाद का भाव है,तो शिकायतें और मन की तकलीफें 0% पर रहेगी,लेकिन अगर आपके जीवन में 50% धन्यवाद का भाव है 50% शिकायत है तो जीवन में दुख और सुख दोनों आते जाते रहेंगे,लेकिन अगर आपकी जिंदगी में 100% शिकायतें ही शिकायतें हैं और 0% धन्यवाद का भाव है तो आपका मन हमेशा दुखी रहेगा, आपको पता है कि दुख भी जगह ढूंढता है कि इस इंसान को हर बात से तकलीफ होती है यह मेरा पक्का ग्राहक है अगर मैं इसके पास जाऊंगा तो यह बाहे खोलकर मेरा स्वागत करेगा,क्योंकि इसे हर चीज से तकलीफ होती है,याद रखना जीवन में शिकायतें जितनी ज्यादा होगी दुख भी उतना ज्यादा होगा और जिंदगी में जितना धन्यवाद का भाव होगा,जीवन उतना ही आनंद से भर जाएगा,ईश्वर को धन्यवाद हम ईश्वर के लिए नहीं करते हैं,हम खुद के लिए करते हैं,हम यह रिलाइज करने के लिए करते हैं कि कई लोगों को वह सब कुछ नहीं मिला है,वह ईश्वर ने,प्रकृति ने,हमको दिया है,एक व्यक्ति तपती हुई धूप में चला जा रहा था,बहुत गरीब था,पैरों में पहनने के लिए चप्पल भी नहीं थी,ऊपर से तेज धूप बढ़ रही थी और गर्मी से उसके पैर जल रहे हैं,वह धूप में चला जा रहा था और ईश्वर से शिकायत कर रहा था की है ईश्वर यह तेरा न्याय है मुझे इतना गरीब बनाया है,क्या दिया है तुमनेमुझे,इतनी तेज धूप है, और मेरे पास पैरों में पहनने के लिए चप्पल तक नहीं है,वह ईश्वर से शिकायत कर ही रहा था,तभी उसके सामने से एक व्यक्ति गुजरा जो जमीन पर घसीट घसीट कर चल रहा था,क्योंकि उसके पास पैर ही नहीं थे,जब उस घसीटते हुए व्यक्ति को उसने देखा तो उसका मन उसी समय धन्यवाद से भर गया,की है ईश्वर,तेरा लाख लाख धन्यवाद है कि कम से काम में अपने पैरों पर तो चल पा रहा हूं,इस बेचारे के पास तो पैर भी नहीं है,जीवन में जब भी शिकायत आए ना तो एक बार उन लोगों पर नजर जरुर डालना,जो वह सब हासिल करने में लगे हुए हैं,जो ईश्वर ने आपको दिया है,चॉइस आपकी है,अगर आप जिंदगी से शिकायतें करोगे तो दुख आपका साथी बनकर खड़ा हो जाएगा,अगर आप अपनी जिंदगी को धन्यवाद से भर दोगे तो आपकी पूरी जिंदगी आनंद से भर जाएगी

